This page features a video of the poem “धरती स्वर्ग समान (Dharati Svarg Saman)”, prescribed under the Karnataka State Syllabus for 6th Standard Hindi First Language. Along with its summary in three languages and transliterated songs. It serves as a valuable learning resource for students and parents, with each song accompanied by its respective lyrics for easy sing-along. The synchronized lyrics help learners follow and recite the song as it progresses, making memorization and learning by heart easier, more effective, and enjoyable.
Lyrics
Hindi
जाति-पाँति से बड़ा धर्म है,
धर्म-ध्यान से बड़ा कर्म है,
कर्मकांड से बड़ा मर्म है,
मगर सभी से बड़ा यहाँ यह छोटा-सा इनसान है,
और अगर वह प्यार करे तो धरती स्वर्ग समान है।
जितनी देखी दुनिया दुनिया सबकी देखी दुल्हन ताले में,
कोई कैद पड़ा मस्जिद में कोई बंद शिवाला में,
किसको अपना हाथ थमा दूँ, किसको अपना मन दे दूँ?
कोई लूटे अँधियारे में, कोई ठगे उजाले में,
सबका अलग-अलग ठनगन है,
सबका अलग-अलग वंदन है,
सबका अलग-अलग चंदन है,
लेकिन सबके सिर के ऊपर नीला एक वितान है,
फिर जाने क्यों यह सारी धरती लहू-लुहान है?
हर बगिया पर तार कँटीले, हर घर घिरा किवाडों से,
हर खिड़की पर परदे, घायल आँगन हर दीवारों से,
किस दरवाजे करुँ वंदना, किस देहरी मत्था टेकूँ,
काशी में अँधियारा सोया, मथुरा पटी बज़ारों से,
हर घुमाव पर छीन-झपट है,
इधर प्रेम, तो उधर कपट है,
झूठ किए सच का घूँघट है,
फिर भी मनुज अश्रु कि गंगा, अब तक पावन प्राण है,
और नहीं ले उसमें तो फिर मानव ही भगवान है।।
धर्म-ध्यान से बड़ा कर्म है,
कर्मकांड से बड़ा मर्म है,
मगर सभी से बड़ा यहाँ यह छोटा-सा इनसान है,
और अगर वह प्यार करे तो धरती स्वर्ग समान है।
जितनी देखी दुनिया दुनिया सबकी देखी दुल्हन ताले में,
कोई कैद पड़ा मस्जिद में कोई बंद शिवाला में,
किसको अपना हाथ थमा दूँ, किसको अपना मन दे दूँ?
कोई लूटे अँधियारे में, कोई ठगे उजाले में,
सबका अलग-अलग ठनगन है,
सबका अलग-अलग वंदन है,
सबका अलग-अलग चंदन है,
लेकिन सबके सिर के ऊपर नीला एक वितान है,
फिर जाने क्यों यह सारी धरती लहू-लुहान है?
हर बगिया पर तार कँटीले, हर घर घिरा किवाडों से,
हर खिड़की पर परदे, घायल आँगन हर दीवारों से,
किस दरवाजे करुँ वंदना, किस देहरी मत्था टेकूँ,
काशी में अँधियारा सोया, मथुरा पटी बज़ारों से,
हर घुमाव पर छीन-झपट है,
इधर प्रेम, तो उधर कपट है,
झूठ किए सच का घूँघट है,
फिर भी मनुज अश्रु कि गंगा, अब तक पावन प्राण है,
और नहीं ले उसमें तो फिर मानव ही भगवान है।।
Summary
यह कविता जाति, कर्मकांड और धार्मिक विभाजनों से ऊपर मानवता और प्रेम को रखती है।
लोग अलग-अलग तरीकों से पूजा करते हैं, फिर भी सभी एक ही आकाश के नीचे रहते हैं। कवि
पूछता है कि घृणा, विभाजन, छल और हिंसा से धरती घायल क्यों है। इन भेदों के बावजूद मानव
के आँसू पवित्र बताए गए हैं। कविता का संदेश है कि प्रेम करने वाला मनुष्य धरती को स्वर्ग के
समान बना सकता है।
लोग अलग-अलग तरीकों से पूजा करते हैं, फिर भी सभी एक ही आकाश के नीचे रहते हैं। कवि
पूछता है कि घृणा, विभाजन, छल और हिंसा से धरती घायल क्यों है। इन भेदों के बावजूद मानव
के आँसू पवित्र बताए गए हैं। कविता का संदेश है कि प्रेम करने वाला मनुष्य धरती को स्वर्ग के
समान बना सकता है।
Author
गोपालदास 'नीरज'